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जिस घर में रहते हैं, वह अपना किस तरह होता है?
नीलसर की गली में कुसुम की दो चाबियाँ हैं, रितु की एक कॉपी और कई परिवारों के किराए की रसीदें। एक कंपनी का प्रस्ताव आता है तो उसी आँगन में रहने वाले लोगों के सामने अलग-अलग सवाल खड़े हो जाते हैं।
कुसुम अपनी जगह नहीं छोड़ना चाहती। मधु को अगले महीने का किराया देखना है। रघुवीर और रितु को दुकान, पढ़ाई और घर के बीच अपना समय बाँटना है। साथ रहने वाले सब लोग एक ही जवाब नहीं दे सकते।
छत की मरम्मत, पानी की बारी और देर से मिलने वाले पैसे के बीच वे बैठकर बात करते हैं। कोई खरीदने का रास्ता खोजता है, कोई किराएदार रहना चाहता है। किसी के लौटाए पैसे भी एक जरूरी उत्तर हैं।
किराये का आँगन नीलसर की किताबें की चौथी पुस्तक है। सहाय परिवार और उसकी गली की इस कहानी में अपना घर बनने से पहले एक-दूसरे की बात सुननी पड़ती है।
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