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बहन की शादी के लिए लिया गया ऋण नयन के खाते में आया था। उसकी तारीख़ें पूरे घर में फैल गईं। एक रुका हुआ वेतन, लौटती किस्तें और फ़ोन पर चमकता एक संदेश: 'सर, ईएमआई जमा कर दीजिए। कल तारीख़ है।'
संदेश भेजने वाली अवनि की तस्वीर में उसकी आँखों का सिर्फ़ एक हिस्सा दिखता है। नयन उसका चेहरा देखना चाहता है। अवनि चाहती है कि वह कोई ऐसी तारीख़ बताए जिस पर सचमुच पैसे जमा कर सके।
दोनों की बात एक बकाया राशि से शुरू होती है। फिर उस बात में बहन की सिलाई, माँ की चुप्पी, पिता की अधूरी दुकान और अवनि की अपनी थकन जगह बनाने लगते हैं। लेकिन जिस नंबर पर किसी का काम जुड़ा हो, वहाँ किसी का इंतज़ार करना कितना आसान है?
किस्त नहीं, इश्क़ बाकी है प्रेम, कर्ज़ और उन बातों की कहानी है जिन्हें भेजने से पहले हम कई बार मिटाते हैं।
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