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खोई हुई चीज़ का मालिक अनजान हो सकता है, पर वह चीज़ मालिकहीन नहीं हो जाती। खोया-पाया लोक में पहुँची खोई वस्तुएँ इसी हक़ के साथ सँभाली जाती हैं। उन्हें देखना और अपना मानकर उठा लेना एक बात नहीं है; दावे, पहचान और अनुमति की अपनी रीत है।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति इस बस्ती में बीस दिन ठहरते हैं। एक साधारण छल्ला सारंग को उस जीवन की संभावना याद दिलाता है जिसे वह पहले ही न्यौछावर कर चुका है। एक पुराने नक्शे का टुकड़ा इनाया के सामने पढ़ने से पहले हक़ समझने का सवाल रखता है।
शतद्वार की छब्बीसवीं किताब पूछती है: किसी चीज़ को सँभालना क्या उसे पाने जैसा है? और जो लौट नहीं सकता, उसकी याद के साथ आगे कैसे चला जाए?
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