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इस लोक में खुशी दिखती है। जिसे जो अच्छा लगता है, उसके भीतर से एक हल्की रोशनी उठती है, और खुली रखी प्लेटें उसे समेट लेती हैं: एक प्लेट एक दीये की पूरी रात, एक पेटी बारह दीयों की एक रात। ढकी रहने पर प्लेट कुछ नहीं लेती, और अपने दीयों और धूप से इस रोशनी का कोई लेना-देना नहीं।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति ऐसे चौक में उतरते हैं, जहाँ रोशनी का बैंक है, पेटियों की गिनती है, और साल भर का हिसाब। यहाँ एक बड़े दिखावे की तैयारी चल रही है, और उससे पहले चारों को सुरक्षा, मरम्मत और बराबरी की राह ढूँढनी है, क्योंकि कोई कानून किसी से मुस्कान नहीं माँग सकता, और जबरन जलाई गई बत्ती किसी की खुशी नहीं होती।
शतद्वार की अठारहवीं किताब एक सवाल रखती है: जब खुशी ही रोशनी हो, तो उसे बाँटने का हक किसका है? और जिसकी खुशी सबसे ज्यादा रोशनी दे, उसके पास अपनी खुशी का हक कितना बचता है?
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