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पाँच गणनाएँ। एक ही मकान। हर बार एक परिवार।
सेवानिवृत्त उप-निदेशक ब्रजमोहन सान्याल को बंद होते अभिलेख-कक्ष में तीस दिन का काम मिलता है: पुराने रजिस्टरों का मिलान। पहले ही हफ़्ते उसे वार्ड 7, गली 4 का मकान 61/क मिलता है, जो हर गणना में दर्ज है। जबकि उसी पते पर एक ऊँची दीवार और ताला है। इकतानवे की सूची पर नीचे जो हस्ताक्षर है, वह उसका अपना है। उसे वह दिन याद नहीं।
कोई चाहता है कि वह पन्ने न पलटे। रजिस्टर बदल जाते हैं, उसके घर में अनजान चीज़ें मिलती हैं, और जिन पर वह भरोसा करता है उनकी बातें आपस में नहीं मिलतीं। एक युवा अभिलेख-कर्मी, एक पुराना अफ़सर, एक बिल्डर और एक थानेदार, सबके पास अपना-अपना काग़ज़ है।
जिस आदमी ने उम्र भर लोगों को गिना, अब उसे पूछना है कि उसने क्या नहीं गिना।
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