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सिंहपुरा की उन्नीस बरस की जानकी अपने पिता के स्कूल में पढ़ाना चाहती है। लेकिन गाँव की ज़मीन के काग़ज़ बदलने की कोशिश उसके घर की शांति छीन लेती है। मास्टर दीनानाथ का दस्तख़त से इनकार उसे ऐसी लड़ाई में खींचता है जिसका रास्ता बीहड़ों तक जाता है।
बाबा गजराज की दुनिया में जानकी बंदूक चलाना सीखती है। पनाह, बदला और भरोसा वहाँ अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। हर वार के साथ ख़तरा बढ़ता है, और हर साथी के साथ विश्वासघात की आशंका।
चंबल उसे रानी कहने लगेगा। मगर इस नाम की क़ीमत कौन चुकाएगा?
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