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इस लोक की बस्ती अपने पैरों पर चलती है। वह रुकती नहीं: मोड़ पर उसकी चाल धीमी होती है, कभी किसी पैर की चाल ढीली पड़ती है, पर थाप चलती रहती है, क्योंकि लंबा ठहराव इस लोक में जानलेवा है। ठहरने-घर ज़मीन पर हैं; बस्ती अपनी राह पर उनके पास से गुज़रती है, और गुज़रते हुए उसके लोग चलती रसोई में खाना बनाते हैं, चलती छतों के नीचे सोते हैं, और चलते हुए अपने बूढ़ों का ख्याल रखते हैं।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति इस चलती बस्ती के साथ कुछ दिन चलते हैं। यहाँ उतरने के अधिकार का अपना क्रम है, अपना काम चुनने की राह है, और आने वाले अन्न के दिन का हिसाब। राह में छूटते लोगों के लिए ठहरने की जगहें ढूँढी जाती हैं, और एक छूटती हुई गाड़ी के साथ यह सवाल हर किसी के सामने आ जाता है।
शतद्वार की इक्कीसवीं किताब एक सवाल रखती है: जिस बस्ती की जान उसकी चाल में हो, वहाँ किसी के लिए रुकने की गुंजाइश कैसे बनती है? और जब सब कुछ चलता रहे, तो देखभाल किसके कंधों पर रहती है, और उसका हिसाब कौन रखता है?
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