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कसवंतपुर की सर्दी में तिलोत्तमा का दिन दो रसोइयों के बीच बीतता है। भोजन केंद्र की नौकरी, माँ के आठ ग्राहकों का खाना और दर्द करती कलाई। तभी घर खाली करने का नोटिस आता है। सामने के किराये वाले कमरे में अभिराज अपने पिता और लकड़ी की अधूरी चीजों के साथ रहने आता है।
एक खरीदी हुई मेज, चाय का कप और नदी किनारे का मेला दोनों को पास लाते हैं। मगर अपने समय की जगह बनाने का प्रश्न प्रेम के भीतर भी बना रहता है। अभिराज एक साथ का घर सोचता है; तिलोत्तमा पहले अपना कमरा और अपनी कमाई सुरक्षित रखना चाहती है। माँ का संदूक, पिता की पुस्तकों की शेल्फ, बेटी का अलग जीवन और काम के बदलते घंटे किसी बड़े वादे से पीछे नहीं हटते।
पुराना घर छूटेगा। नीम दूसरी जमीन में जाएगा। दो नई रसोइयाँ खुलेंगी। क्या साथ रहने की इच्छा बिना दूसरे का पूरा दिन लिये जगह पा सकती है?
चूल्हे में बची धूप वयस्क प्रेम और घरेलू श्रम की कथा है। इसमें निकटता छोटे चुने हुए समय में आती है, और स्नेह का स्वाद तब बदलता है जब हर हाथ का अपना हिस्सा भी रहता है।
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