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ईशिता सेठी दिल्ली की साइबर-सुरक्षा इंजीनियर है। 2028 में उसके भाई यश ने ऑनलाइन ब्लैकमेल से तंग आकर जान दे दी थी। माँ मीना और पिता राजीव के साथ वह उस घर में रहती है जहाँ भाई का नाम लेना मना-सा हो गया है। सितंबर की एक रात उसकी आँखें डिजिटल नेटवर्कों में देखने लगती हैं। पर इसकी क़ीमत सिरदर्द और नींद की कमी है, और बिना नेटवर्क वह लगभग अंधी हो जाती है। उधर शहर में लोगों की डिजिटल पहचान एक-एक कर मिट रही है। क्या ईशिता उस चेहरे-विहीन छाया तक पहुँच पाएगी?
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