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माँ कमला के जाने के सात महीने बाद सुलभा काम, किराए और अपनी थकान के बीच जी रही है। एक अस्थायी जरूरत उसके पिता हर्षवर्धन को उसके घर ले आती है। रसोई की छोटी आदतों से शुरू हुई बातचीत धीरे-धीरे देखभाल, स्वतंत्रता और उन स्मृतियों तक पहुँचती है जिनमें माँ केवल त्याग की प्रतिमा नहीं, एक पूरी इंसान थीं। पड़ोस, काम की रसोई और छोटी कक्षाओं के बीच यह पारिवारिक उपन्यास प्रेम और नियंत्रण के फर्क को सुनता है। किसी अपने को याद रखते हुए अपने हिस्से का जीवन कैसे बचाया जाए?
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