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रेवा देशमुख की जिल्दसाजी की दुकान में एक पुराना बंडल आता है। चौदह लिफाफों के बीच एक ऐसा पत्र है जिसका प्रेषक उस केंद्र की बही में मृत दर्ज है। केंद्र तेरह वर्ष पहले बंद हो चुका है। उसकी जगह अब एक दीवार है, और उस पते पर कोई नहीं मिलता।
कागज बचाने से शुरू हुआ काम पुराने शुल्क, लौटे परीक्षा-पत्र और एक परिवार की चुप्पी तक पहुँचता है। हर गवाही कुछ साफ करती है, कुछ उलझाती है। रेवा की मौसी तारा के अपने हस्ताक्षर उस गलत सूचना के नीचे हैं। दूर के शहर में एक बच्ची अपने पिता के शब्द लिखती है। किसी के पास पुराना पता है, किसी के पास बोलने का कारण नहीं।
जिस पते पर कोई नहीं था अभिलेखों के पीछे छूटे जीवन की रहस्य-कथा है। यह पूछती है कि गलत दर्ज हुआ नाम ठीक हो जाने के बाद किसका घर लौटता है, और किसे अपना रास्ता फिर भी स्वयं चुनना पड़ता है।
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