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कांसागढ़ में सोने वाला हर आदमी एक ही सपना देखता है। रोशन पुल, दीप लिए भीड़, बुझती बत्तियाँ और सुबह बिखरे जूते। सबको एक ही रात याद रहती है: दीपदान की इक्कीसवीं रात।
मीनू रात में नगर भवन की सफाई करती है। उसे सपना नहीं आता। मगर डर से बदलते शहर में उसकी नीली कॉपी उन लोगों का हिसाब रखती है जिन्हें बड़े फैसलों में कोई नहीं गिनता।
कोई नहीं जानता सपना क्या है। शहर को अब तय करना है कि इस डर के साथ वह दूसरों के लिए क्या करेगा।
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