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सिरमऊ में एक सुबह लोग उठते हैं तो सूरज की जगह अँधेरा मिलता है। नगर ने अपने उजाले का अंतराल बेच दिया है। घड़ीकार इला बक्षी अपनी मशीन की जाँच से ऐसे हिसाब तक पहुँचती है जिसमें चार इकाइयों के सामने पाँच वादे लिखे हैं। एक प्रशिक्षु की परीक्षा, चूल्हे का किराया, बस की पाली और व्यापारी के पुराने अधिकार उस हिसाब में अपनी जगह माँगते हैं। लेकिन दूसरों के छोटे अक्षर पढ़ने वाली इला अपने आर्थिक दबाव में खुद एक परिशिष्ट का गलत अर्थ मान लेती है। उजाला लौटाना किसी एक घंटी का काम नहीं। पुराने कागज, धातु के छोटे दाँत और अपनी सीमा कहने वाले लोग मिलकर रास्ता खोलते हैं। हास्य और नागरिक कल्पना के बीच यह अपने काम, अपने दिन और अपने विराम की कहानी है।
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