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जिन काग़ज़ों को वह दूसरों के लिए पढ़ती रही, उनमें अब अपने घर का नाम है।
सिंधुपुर की चौकी नंबर तेरह से अदालत तक का रास्ता सीधा नहीं है। गवाही याद की तरह बदलती है, और एक सही दस्तख़त ग़लत बात के नीचे भी हो सकता है।
सब-इंस्पेक्टर नंदिनी राठौर के सामने अब वह नाम है जिसे पढ़ना सबसे मुश्किल है। बंद मिल की ज़मीन, छह मौतें और कस्बे का सबसे बड़ा सच, सब इसी आख़िरी हिस्से में आमने-सामने आते हैं।
अंत में सब कुछ वापस नहीं मिलता। पर कुछ चीज़ें बचाई जा सकती हैं।
तेरह नंबर की गवाही चौकी नंबर तेरह शृंखला की छठी और अंतिम पुस्तक है: एक छोटे कस्बे की चौकी, एक ज़िद्दी अफ़सर और सच की धीमी आँच वाली कहानी।
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