You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
इस बसाहट में गिनती क़ानून है: तेरह शुभ, तीन अशुभ। हर क़तार की तीसरी चीज़ अपनी नहीं रहती, और हर तीसरे बरस अगुवा-रथ कहीं राह में टूटता है। पुजारी कहते हैं यही क़ानून है, और क़ानून के आगे अंदाज़ा नहीं चलता।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति इस लोक में उतरते हैं, और तेरहवाँ द्वार खुला है, स्थिर। चारों के अपने-अपने हिसाब हैं: बही, कापी, रजिस्टर, और हथेलियों की याद। तभी बसाहट की गिनती उनसे अपना सबसे पुराना सवाल पूछती है: जिस गिनती में तुम्हारा हिस्सा पहले से लिखा हो, उसमें अपना हिस्सा कैसे बचे?
शतद्वार की तेरहवीं किताब एक सवाल रखती है: जब क़ानून खुद अपने व्याकरण में फँस जाए, तो उसे कौन सुलझाता है? और जो गिनती बरसों से लेती आई हो, उसे वापस लौटाने की रीति कौन जानता है?
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book तेरह शुभ, तीन अशुभ.