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रियासत कालीधार के रेगिस्तान में एक सौ सत्तासी कोस लंबी तार-लाइन खींचने के लिए चौबीस दिन मिले हैं। सर्वेक्षक रामानुज वत्स की एक आँख नहीं देखती, पर उसकी बही में हर माप दर्ज है।
पचपन कोस के बाद पहली दीवार आती है: एक गहरा खड्ड, जिसके पार की ज़मीन किसी ने नहीं नापी। साथ में हैं तार-सेविका कमलिनी देव, जिसके पति की पीतल की घड़ी अब भी पाँच मिनट आगे चलती है, और ऊँट-सरदार जोगिंदर खान, जिसका बेटा पिछली गर्मियों में इसी रास्ते पर लौटा नहीं। कंपनी की समय-सीमा गुज़र रही है, रसद घट रही है, और उस पार से कभी हाथ दिखते हैं, कभी लालटेन।
जब पहली डोर खड्ड के ऊपर से जाती है, तो सवाल सिर्फ़ यह नहीं रह जाता कि तार पहुँचेगा या नहीं। सवाल यह हो जाता है कि दूसरी तरफ़ जो है, उस पर कितना भरोसा किया जाए, और जो नहीं जाना है, उसे जानने की जल्दी कब ठीक है।
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