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तीस साल देर से पहुँचा एक खत।
मीरा अपना जीवन जी चुकी है। घर, काम, बेटी और देवेंद्र के साथ बिताए वर्षों की यादें उसकी अपनी दुनिया हैं। अनिरुद्ध की दुनिया भी उन दिनों जैसी नहीं रही जब वह उत्तर की प्रतीक्षा करते थे।
एक पुराना लिफाफा दोनों के बीच लौट आता है। उसने लिखी हाँ अब किसकी है? छब्बीस साल की लड़की की, या आज अपनी शर्तों पर जीती स्त्री की?
यह प्रेम के लौटने की कहानी है। उन लोगों और वर्षों को मिटाए बिना, जिन्होंने उस प्रेम की अनुपस्थिति में भी जीवन को पूरा बनाया।
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