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इस लोक में एक चीज़ दो हो सकती है। बनाई-घर की चिह्नित पूर्व शय्या पर रखी मूल वस्तु, पूरी तरह बंद करके फिर खोले गए आवरण के नीचे, युग्मित पश्चिम शय्या पर एक प्रतिरूप देती है, और मूल अपनी जगह अपनी हालत में रहती है। लौटाना केवल पूरा होता है; जो सामग्री खो जाए, जल जाए या चुक जाए, उसका लेखा हमेशा के लिए खुला रह जाता है।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति ऐसी बसी में उतरते हैं, जहाँ यह काम रोज़ का है: नामावली लिखी जाती है, गवाह रखे जाते हैं, पाट बाँटे जाते हैं, और बनाई-घर की संरक्षिका अपने उसूलों पर खड़ी रहती है। उन्नीस दिनों में एक तुलना होती है, एक नया व्यक्ति अपनी पूरी यादों के साथ खड़ा होता है, और बसी को तय करना होता है कि काम, पाट, कमरा और नाम में हक़ किसका है। सहमति से हक़ का लेखा लिखा जाता है, पर हक़ लिख देने से दिल का हिसाब नहीं चुकता।
शतद्वार की उन्नीसवीं किताब एक सवाल रखती है: जब एक ही जीवन के दो हिस्से अलग-अलग साँस लें, तो जीवन का मालिक कौन है? और जो खुद लौटने का फ़ैसला करे, उसकी मर्ज़ी की कीमत कौन चुकाता है?
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