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रेवती साहू के दिन में सबके लिए समय है। अपने लिए एक मिनट भी माँगना उसे उधार लेने जैसा लगता है। सिलाई की मशीन, बच्चों की पढ़ाई और घर के छोटे-बड़े कामों के बीच एक सुबह वह दौड़ती हुई स्त्रियों को देखती है। फिर पहली बार अपने लिए सड़क पर कदम रखती है।
एक मिनट से दस किलोमीटर तक का रास्ता सीधा नहीं है। दर्द, कमाई की चिंता और घर की पुरानी आदतें बार-बार उसे रोकती हैं। दोस्त साथ हैं, लेकिन उनकी अपनी मुश्किलें भी हैं। उसे किसी को हराकर नहीं, अपने शरीर और जीवन को सुनकर आगे बढ़ना सीखना है।
यह कहानी पदक से बड़ी जीत का दावा नहीं करती। यह उस जगह की कहानी है जो एक साधारण स्त्री अपने दिन, अपने घर और अपनी सड़क पर धीरे-धीरे बनाती है।
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