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घर चाहिए, या वह?
बात अब कस्बे से निकलकर दुनिया तक पहुँच चुकी है। दुकान और कैफ़े पर असर पड़ने लगा है, और हरीदत्त साफ़ कह देते हैं: घर चाहिए तो वह नहीं।
सर्दी की धुंध में सुलोचना दीदी के उन्नीस सौ पचहत्तर का पूरा सच बाहर आता है। दबाव बढ़ता है, और चैताली को दिल्ली लौटना पड़ता है।
बस की खिड़की से वह एक बार पीछे देखती है। कौन आया है, और कौन नहीं?
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