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बेलसर की छोटी अदालत में अनिमेष कटारे रोज़ दूसरों के कागज पढ़ता है। फिर एक दिन केसर देवी अपने घर की लिखत लेकर आती हैं। हस्ताक्षर उनके हैं, लेकिन जिस अर्थ पर उन्होंने भरोसा किया था वह पन्ने पर नहीं मिलता। सवाल केवल घर का नहीं रहता। एक पुराना मसौदा, माँ की कही बात और अनिमेष के अपने काम की अधूरी सीमा उसके सामने खुलने लगती है।
इस दीवानी मुकदमे में कोई आसान निर्दोष हाथ नहीं। मदद और अधिकार, याद और प्रमाण, भरोसा और सहमति के बीच लोगों को अपनी-अपनी जगह पहचाननी है। अदालत एक लिखत का अर्थ तय कर सकती है। उसके बाद रिश्तों और रोज़ के काम में क्या बदलना है, यह निर्णय उन्हें खुद लेना होगा।
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