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इस द्वार से जुड़ी बस्ती में औपचारिक रूप से दी गई शारीरिक सजा का दर्द किसी दूसरे तक पहुँच सकता है। यह हर चोट का नियम नहीं, न किसी की निर्दोषता या दोष का प्रमाण है। कागज पर दर्ज फैसला और चोट सहने वाले का जीवन एक ही बात नहीं रह जाते।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति बस्ती के लेख, रखवाली और काम की राह देखते हैं। सवाल केवल इतना नहीं कि किसका नाम लिखा है, बल्कि यह भी कि लिखी बात से कौन-सा काम होता है और उसकी जिम्मेदारी कौन लेता है।
शतद्वार की तीसवीं किताब पूछती है: जो चोट हो चुकी है उसे मिटाए बिना, अगली चोट रोकने का रास्ता कैसे बनाया जाए? और किसी नियम को निभाना कब उसके पक्ष में खड़े होना बन जाता है?
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