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कुछ घर ईंटों से नहीं, नियमों से टिके होते हैं। सूर्यगढ़ के अवस्थी-घर की सबसे भारी विरासत ज़मीन नहीं - दो ग्रंथ हैं: मर्यादा-संहिता, जो कहती है क्या करना चाहिए और क्या कभी नहीं; और लीला-तंत्र, जो कहती है सही काम, सही समय पर, कैसे करना चाहिए। बारह साल पहले पिता व्रजमोहन की विदाई के साथ घर की घड़ी दो बजकर चालीस मिनट पर ठहर गई - और दो भाइयों के रास्ते बँट गए। सत्य - छत्तीस साल का वकील, मर्यादा का पथ। कुशल - तीस साल का बेपरवाह, लीला की चाल। जब शैलकेतु सिंह और उसके बेटे रौद्रेश की साज़िश आँगन-वाले घर को नीलामी के कटघरे तक पहुँचा देती है, तो माँ पद्मलेखा के पास बचता है सिर्फ़ एक दाँव - और दोनों भाइयों को जीवन में पहली बार दोनों किताबें एक ही मेज़ पर रखनी पड़ती हैं। तालाब की रातों से अदालत की दोपहरों तक, पुरानी बही-खातों और बुज़ुर्ग गवाहों तक - यह कथा उस लड़ाई की है जो एक घर के लिए, एक माँ के सम्मान के लिए और उस विरासत के लिए लड़ी गई जो कागज़ों में नहीं, चरित्र में लिखी जाती है। और जब रुकी घड़ी फिर चलने लगती है, तो सूर्यगढ़ देखता है - दो अंश, जो अब एक युग हैं।
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