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एक पुरानी मिल। एक काँसे का द्वार। और एक रक्षक, जिसकी ज़ुबान पर सच का धागा बँधा है।
विकी देशपांडे अब झूठ नहीं बोल सकता। मुंबई की रात में, लालबाग की लक्ष्मी-सूत मिल के नीचे, पाँच हज़ार साल पुरानी रत्न-पुरी का द्वार खुलने वाला है, और उसे खोलने वाला सेठ मयंक अपनी मरी हुई पत्नी को लौटाने के लिए पूरे शहर को दाँव पर लगा चुका है। पीतल के यंत्र-दास जाग रहे हैं। फुटपाथ के तीस लोग सो रहे हैं, और कोई सुन रहा है।
हर मंत्र की क़ीमत है। हर शपथ की भी। और इस रात किसी को अपनी सबसे प्यारी याद देनी होगी, किसी को अपनी देह का एक हिस्सा, और किसी को अपना सबसे पुराना भरोसा।
पर जब सुबह आएगी, तब पानी के पार से एक आवाज़ किसी को उसके असली नाम से पुकारेगी।
निधि-नगर का पहरेदार। अंतराल यूनिवर्स, श्रृंखला 1: टूटता पर्दा, पुस्तक 4।
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