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एक पुराना संदूक। कई अनसुनी आवाजें।
सरोज के कमरे में सीलन उतरती है तो बरसों से बंद संदूक हटाना पड़ता है। उनकी नातिन पारी उसके भीतर कपड़े, चाँदी और तस्वीरें खोजती है। परिवार को एक पुराना पत्र मिलता है।
दुकान की पहली शाम, आठ सौ रुपये का उधार और एक छोटी बच्ची की पायल। उस बीते दिन के साथ कोई ऐसा दिन जुड़ा है जिसे घर में बच्चे एक तरह से याद नहीं रखते।
मीना अपनी दबी हुई हँसी लेकर आती हैं। दिनेश पिता की कॉपी खोलते हैं। सरोज अपने जीवन के उन हिस्सों को कहने लगती हैं जो किसी बही में दर्ज नहीं हुए। पारी सुनती है, पूछती है और अपनी कहानी लिखती है।
नानी का संदूक नीलसर की किताबें की तीसरी पुस्तक है। सहाय परिवार की कहानी यहाँ घर की स्त्रियों, पुरानी दोस्ती और एक नई पेशकश तक आगे बढ़ती है।
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