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एक नगर में पहचान का कागज केवल परिचय नहीं है। पूरी कही घोषणा के साथ लिखा एकल अधिकार उस सीमा के भीतर रखी हुई चीजों पर असर करता है। साधारण ताला और वही चाबी अलग हाथों में अलग तरह से चलते हैं।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति इस असर को अपनी आँखों से देखते हैं। अब उनके सामने केवल ताला खोलने का प्रश्न नहीं, उस लिखे अधिकार को समझने और अपनी पूरी बात कह पाने की कठिनाई भी है।
शतद्वार की बत्तीसवीं किताब उन नामों के साथ चलती है जिनके पीछे रिश्ते, काम और अपने चुनाव हैं। जहाँ पहचान एक कतार में बाँधी जाए, वहाँ मनुष्य की पूरी बात किस तरह सुनी जा सकती है?
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