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एक पहाड़ है जहाँ हर चढ़ने वाले की पीठ पर उसका अपना पछतावा पत्थर बनकर बँध जाता है। उसे कोई किसी दूसरे को नहीं दे सकता।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति बढ़ते हैं। रास्ते में कोई अपना बोझ उतारकर हल्का होता है, कोई उसे थामे रखता है, और कोई ऊपर पहुँचकर खाली बैठा रह जाता है।
शिखर कुछ माँगता है। सारंग को तय करना है कि वह क्या देगा और क्या नहीं। शतद्वार की चौंतीसवीं किताब छोड़ने और भूलने के बीच के फ़र्क की कथा है।
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