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राघव झा पटना के एक किराये के कमरे में रहता है। किताबों से भरा बक्सा, घर से आने वाले रुपये और एक बड़े पद की उम्मीद उसके दिनों का हिसाब बनाते हैं। हर असफलता के बाद घर पूछता है: अब आगे क्या?
लेकिन घर में केवल उसका सपना नहीं है। पिता की सिलाई धीमी हो रही है। मां अपने श्रम का दाम तय करना सीख रही हैं। बहन अपने लिए पढ़ाई का रास्ता मांगती है। और अनन्या, जिसके साथ राघव भविष्य देखना चाहता है, अपनी जिंदगी रोककर उसका परिणाम नहीं देख सकती।
जब डर उसे अपनी कमाई के बारे में झूठ बोलने पर मजबूर करता है, परीक्षा से अलग एक भरोसा टूटता है। अब उसे अपनी गलती का सामना भी करना है और अगला पन्ना भी लिखना है।
पटना का किरायेदार असफलता, परिवार, प्रेम और काम की कथा है। उस युवक की कथा जो सूची में अपना नाम खोजते-खोजते यह पूछना सीखता है कि सूची के बाहर उसकी जिंदगी किसकी है।
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