You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
पिता की मृत्यु के छह सप्ताह बाद अन्विता घर लौटती है। सपने में वह उनके साथ एक पूरा दिन बिताती है: बस की यात्रा, झील किनारे चाय और बारिश में साथ बैठना। ऐसा दिन उन्होंने सच में कभी नहीं जिया था।
उसे सच में जीने निकली बेटी को पिता की मरम्मत-कॉपी, बकाया और परिचित लोगों की अलग-अलग यादें मिलती हैं। प्रेम के साथ उपेक्षा भी थी। मदद के साथ कुछ पुराने नुकसान भी।
क्या किसी अधूरे आदमी को समझे बिना भी उसके बाद की जिंदगी जी जा सकती है?
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book पिता के अधूरे सपने.