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मणिकर्णिका की आग के सामने अग्निवेश त्रिपाठी एक ऐसी परछाईं देखता है जो रोशनी के नियम नहीं मानती। जयपुर में अन्वया की पेंसिल एक ऐसे घाट की रेखाएँ बनाती है जहाँ वह कभी गई नहीं।
दो शहर। दो युवा। एक इतिहासकार जो उनके डर को भ्रम कहकर टाल नहीं सकती।
काशी के नीचे किसी ने वह बंधन छेड़ दिया है जो दिखाई देने वाली दुनिया को दूसरी दुनिया से अलग रखता है। उसे रोकने के लिए शब्द चाहिए, रास्ता चाहिए और किसी ऐसे मनुष्य का साथ जो पीछे छूटे लोगों को भूल न जाए।
मगर शक्ति अपनी कीमत खुद चुनती है।
एक प्रिय दिन खाली हो सकता है। दुनिया के रंग जा सकते हैं। और जीत के बाद भी पत्थर में पड़ी रेखा बढ़ सकती है।
"पर्दे की पहली दरार" अंतराल की श्रृंखला "टूटता पर्दा" की पहली पुस्तक है। राख, चित्र, परिवार और गुप्त पहरे के बीच शुरू हुई एक यात्रा, जिसका अगला संदेश पूर्व से आता है।
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