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आचार्य विद्याधर झा ने इकतालीस साल एक शब्दकोश लिखने में लगाए। उसका विषय था प्रेम। उसमें अठारह प्रविष्टियाँ होनी थीं, लेकिन उनके जाने के बाद सत्रह मिलीं। अठारहवें पन्ने पर सिर्फ़ शीर्षक-शब्द था।
हर अध्याय में दो आवाज़ें खुलती हैं: बाबा की, जो प्रेम को शास्त्र, कविता और विज्ञान से समझते हैं, और उनकी पोती की, जिसके पास काशी में बिताए सैंतालीस दिन हैं।
एक आदमी ने प्रेम को समझ लिया, लेकिन उसे जी नहीं पाया। प्रेमकोश उस अनकहे शब्द की खोज है।
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