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सोनखेड़ा की बखार में अनाज के हर बोरे का नाम और हिसाब है। घर सँभालने वाले हाथों का हिसाब कौन रखेगा?
एक दुर्घटना के बाद भगवती पहली बार अपना अलग खाता बनवाती हैं। दशकों बाद उनकी बेटी अपना व्यवसाय खड़ा करती है, नातिन दूसरे शहर में अपने काम की जगह चुनती है, और अगली पीढ़ी पुराने आँगन को नए सवालों से देखती है। इस बीच एक पायल, एक खुलती खिड़की और अधूरे कागज परिवार के भीतर दबे प्रश्नों को जीवित रखते हैं।
चार पीढ़ियों की यह सहज, संवेदनशील गाथा पूछती है: क्या प्रेम का अर्थ अपने समय, पैसे और निर्णय का नाम मिटा देना है? और जब घर का दाम लगाया जाए, उसमें रहने वाले जीवन कहाँ लिखे जाएंगे?
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