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भोपाल की एक छोटी-सी सिलाई-मशीन, तीन हज़ार रुपये की चुपचाप दी जाने वाली मासिक किस्त, और एक ऐसा रहस्य, जो उषा ने बरसों किसी को नहीं बताया।
पिता के जाने के बाद नीलसर की गली में सहाय परिवार की ज़मीन का सवाल बाक़ी है। दो एकड़ खेत, पाँच बरस के वारिस, और एक कंपनी का बारह लाख का प्रस्ताव। बड़ी बहन रेखा ने चुपके से एक ऐसा कर्ज़ ले रखा है, जिसकी ख़बर अब सबके सामने आने वाली है। छोटा भाई रघुवीर दुकान और पिता की बही दोनों को अकेले उठाए खड़ा है। और माँ सरोज की चुप्पी में कुछ ऐसा है, जो अभी कहा नहीं गया।
इन सबके बीच खड़ी है उषा, बीच वाली बहन। भोपाल में उसका अपना घर है, अपने बच्चे हैं, अपनी मशीन है। फिर भी तहसील की बेंचों से लेकर धनौरा की पगडंडी तक, हर मोड़ पर वही सबसे पहले पहुँचती है। यह कहानी उस पल की है जब वह तय करती है कि अब सिर्फ़ पुल नहीं बनेगी, अपनी जगह भी बनाएगी।
किस्तों और काग़ज़ों, लाल बही के हाशियों और नीले फ़ोल्डर की इस कथा में हँसी भी है, झगड़ा भी, और वह चुप्पी भी जो परिवारों में सबसे ज़्यादा बोलती है। नीलसर की किताबें की दूसरी पुस्तक।
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