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चार हिस्से कागज़ पर थे। पाँचवाँ किसी नक्शे में नहीं था। मड़ौला कस्बे के उस पुराने घर का मिट्टी का चूल्हा ग्यारह महीने से ठंडा है — जिस दिन से इंदुमती गई। अठहत्तर साल के बाबूजी रोज़ सात उल्टी कटोरियाँ गिनते हैं, और सातवीं कटोरी अब भी उनकी इंदु की है। आँगन की बेंच पर बैठे वे माँ की पुरानी कलाई-घड़ी की टिकटिक सुनते हैं — वही घड़ी, जो कभी सात बजकर बीस मिनट पर ठहर गई थी। फिर बँटवारे का नक्शा आता है। शत्रुघ्न, सूरजभान, अंशुमन और वीरू — चारों बेटों के हिस्से तय होने लगते हैं, और आँगन की मिट्टी पर चूने की एक सफेद लकीर खिंच जाती है। पर माँ की डायरी में एक राज़ छिपा है — पाँचवाँ हिस्सा, जो किसी कागज़ में नहीं जाएगा। जब तक वह न मिले, कोई हिसाब पूरा नहीं होगा। घर बँटेगा या जुड़ेगा? सात कटोरियाँ, एक बुझा चूल्हे और माँ की डायरी से बुनती यह कथा बताती है कि घर लकीरों से नहीं बँटते — और जुड़ते भी लकीरों से नहीं, पकती हुई यादों से जुड़ते हैं।
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