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उनासी बरस के शिवनारायण मिश्र ने जिंदगी भर सबको बारिश से बचाया। डाकघर की नौकरी, तीन बच्चों की पढ़ाई, पत्नी सरला की बीमारी, और बच्चों के नाम का हर कर्ज़, सब कुछ उन्होंने अपनी चुप्पी में समेट लिया।
फिर एक जुलाई की बारिश में, रामपुरा घाट की काई भरी ढलान पर, छतरी हाथ से छूट गई और वे गिर पड़े।
अब बच्चों की बारी थी। पटना, दिल्ली, बेंगलुरु, तीन शहर, तीन घर, तीन-तीन महीने। सब कुछ बराबर, सब कुछ व्यवस्थित। बस एक चीज़ कहीं दर्ज नहीं थी: एक बूढ़े पिता का स्वाभिमान, जो माँगना नहीं जानता।
एक पासबुक में छिपा बरसों पुराना कर्ज़। एक लोहे के संदूक में रखे चार अनखुले लिफाफे। एक बहू की अनकही थकान। और एक रात, जब पिता ने पहली बार "नहीं" कहा।
बूढ़ी छतरी उस उम्र की कहानी है जब सहारा देने वाला हाथ खुद सहारा ढूँढने लगता है। और उस प्यार की, जो कभी-कभी चुप रहकर भी सबसे ज़ोर से बोलता है।
क्या आपने कभी अपने पिता से पूछा है कि वे सचमुच ठीक हैं?
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