You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
बापू चले गए। खेत रह गए। और उनके साथ रह गए वे हिसाब, जिनमें कुछ नाम लिखे थे, कुछ मिटा दिए गए थे।
कचनई के पुराने घर में तीन भाई पिता की ज़मीन बाँटने बैठते हैं। एक ने खेतों में उम्र बिताई है, दूसरा शहर में कर्ज़ से घिरा है और तीसरा अपने काम की शुरुआत चाहता है। उनके बीच माँ सरोज हैं, जिनकी इच्छा को सब चिंता के नाम पर टालते आए हैं। बेटी है, जिसके नाम की जगह अभी पूछी जानी है। बहुएँ हैं, जिनकी मेहनत घर का खर्च बनकर रह गई। और एक मज़दूर स्त्री है, जिसे बापू की डायरी का अधूरा अंक अब तक याद है।
बरसात मेड़ों से होकर गुज़रती है। रसोई का धुआँ अलग होने लगता है। पुराने वादे खुलते हैं। किसी को ज़मीन चाहिए, किसी को अपने दिए का नाम, किसी को बस अपने लिए चार दिन।
बापू की ज़मीन प्रेम को निर्दोष नहीं मानती। यह उस परिवार की कहानी है जिसे अपना घर बचाने से पहले सीखना पड़ता है कि घर के भीतर कौन-कौन रहता था।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book बापू की ज़मीन.