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शिवपुरघाट का राजकीय अस्पताल। बयालीस बिस्तर, एक पुराना बरामदा, और नदी के किनारे बसा एक क़स्बा जो हर बरसात में कट जाता है। डॉ. विदुला सरीन शहर से यहाँ पहली नौकरी पर आती हैं। अधीक्षक पहले ही दिन साफ़ कह देते हैं कि पिछले डॉक्टर दो साल टिके, उनसे पहले वाले छह महीने। फिर तपनी चढ़ने लगती है। पुल बंद होता है, सामान आना रुक जाता है, और वार्ड में हर रोज़ एक बिस्तर कम पड़ने लगता है। दवाओं की गिनती, बिजली की बारी, एक गर्भवती औरत, बुखार में तपता एक बच्चा, और एक बूढ़ी रसोइया जो इस इमारत का इतिहास किसी से बेहतर जानती है। सबके बीच एक सवाल बना रहता है: जब हर जवाब देर से आए, तब कौन रुकता है, और किस क़ीमत पर। बयालीस दिन। बयालीस बिस्तर। और वे लोग, जो हर रात जागते रहे।
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