You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
सुबह साढ़े पाँच बजे देविका डिब्बों वाली रसोई खोलती है। शाम को उसका नाम बारह महिलाओं की सूची में लिखा जाता है। मैदान में एक समय छह खेलेंगी। बाकी को अपनी बारी आने तक तैयार रहना होगा।
नौ साल की बेटी, अलग घर में रहता सह-अभिभावक, पिता की छोटी दुकान, बहन की बदलती बस-पाली और हर महीने का हिसाब। इनके बीच खेल के लिये जगह निकालना पहली गेंद जितना ही कठिन है। फिर साझा कमरे का किराया सामने आता है। एक दल बनाने वाली महिलाओं को साथ खेलना ही नहीं, साथ जगह बचाना भी सीखना है।
बारहवीं खिलाड़ी जीत के बड़े नारे से दूर, काम और घर के बीच अपना समय ढूँढ़ती महिलाओं की कहानी है। इसमें गलत पास है, टूटा जूता है, बाहर बैठने का दुख है और एक छोटी सही पुकार। कभी स्कोर हार दिखाता है; फिर भी अगली शाम का दरवाजा खोला जा सकता है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book बारहवीं खिलाड़ी.