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इस पहाड़ी पड़ाव की संभाली हुई जमीन पर तीन हल्की थपकियाँ ऊपर बची कदमों की लड़ी दोहराती हैं। नई चाल पुरानी को दबा देती है; बारिश और बहाव निशान मिटा सकते हैं। जमीन कदम लौटाती है, चलने वाले का नाम या उसके चलने की वजह नहीं।
सारंग, इनाया, अर्यमन और श्रुति यहाँ सुनना सीखते हैं। सुनी हुई चाल और उससे निकाला गया अंदाज़ा अलग रखना पड़ता है, क्योंकि अधूरा निशान किसी पूरे जवाब का वादा नहीं करता।
शतद्वार की अट्ठाईसवीं किताब सुनने की सीमा और जिम्मेदारी की कहानी है। बीते रास्ते से उतना ही लिया जा सकता है जितना बचा है। और किसी की मदद के लिए कभी जमीन से अधिक लोगों, काम और धीरज की जरूरत होती है।
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