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देवयानी का काम बंद रेडियो में आवाज लौटाना है। पिता के स्ट्रोक की खबर पर वह ग्यारह वर्ष बाद अपने पुराने घर लौटती है। वहाँ पिता की आवाज अब शब्दों तक नहीं पहुँचती, और वे पुराने वाक्य अब भी उसकी याद में साफ हैं जिन्होंने उसे घर से दूर किया था।
नौरंग के उस घर में भाई की दुकान, इला की मेज और छोटी कीर्ति के खेल पहले से जगह लिए हुए हैं। मेरवा में देवयानी की अपनी दुकान भी उसका इंतजार कर रही है। देखभाल के घंटों, अधूरे उपकरणों, एक पुरानी सिलाई मशीन और दो शहरों की यात्राओं के बीच उसे यह सीख देने नहीं, जीकर देखना है कि साथ रहना अपना पूरा जीवन छोड़ देना नहीं होता।
बोले बिना जो रह गया प्रेम और नाराजगी के एक साथ रहने की कथा है। यहाँ बीमारी पुराना दुख नहीं मिटाती, कोई गीत चमत्कार नहीं करता और हर स्पर्श माफी नहीं बनता। फिर भी एक खिड़की खोली जा सकती है, किसी के काम के लिए जगह बच सकती है, और अधूरे उत्तर के बाद अगली बात शुरू हो सकती है।
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