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नौ सेकंड में एक ज़िंदगी बदल जाती है।
मोंटे कार्लो की रोशनी के पीछे एक साँप की आँख खुल चुकी है। एक मरता हुआ बैंकर, काले मख़मल का एक न्योता, और एक नीलामी जहाँ बिकने वाली चीज़ें इंसानी जानें हैं।
विक्रम राठौड़ को जिस आदमी की तलाश है, वह उसका अपना बाईस साल पुराना घाव है। अनाया के साथ बिताई एक रात उसे वह देती है जो उसने कभी नहीं माँगा था: भरोसा। पर भरोसे की क़ीमत इस खेल में सबसे महँगी है।
पेरिस की तंग गलियों से नीस की पहाड़ियों तक, एक यॉट के पेट से कुतुब मीनार की बालकनी तक, हर साँस के बाद एक नया राज़ और हर राज़ के बाद एक नया ख़तरा। तेईस दिसंबर की रात एक शहर, एक मंच, और एक पिता का बाईस साल पुराना इंतज़ार।
कुछ सच देर से लौटते हैं। पर लौटते ज़रूर हैं।
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