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तराज़ू सिर्फ़ वज़न बताती है। किसकी बात सुनी जाए, यह लोग तय करते हैं।
सिंधुपुर की अनाज मंडी में नई फसल की रौनक है, और उसी रौनक के बीच एक व्यापारी मारा गया है। तौल-माप की गड़बड़ी की फुसफुसाहट पहले से थी, पर किसी ने उसे ज़ोर से कहा नहीं।
सब-इंस्पेक्टर नंदिनी राठौर के पास इस जाँच के लिए न अलग कमरा है, न बड़ा अमला। है तो एक मेज़, पुरानी फ़ाइलें, और सिपाही इरफ़ान शेख, जिसके लिए यह पहला बड़ा इम्तिहान है।
तराज़ू के दोनों पलड़े बराबर हो जाएँ, तो क्या न्याय भी बराबर हो जाता है?
मंडी की तराज़ू चौकी नंबर तेरह शृंखला की दूसरी पुस्तक है: एक छोटे कस्बे की चौकी, एक ज़िद्दी अफ़सर और सच की धीमी आँच वाली कहानी।
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