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मुंबई के एक नए सभागार में ध्वनि और निकास-संकेत जाँचने पहुँची देविका सावंत के सामने ऐसी आवाज़ें आती हैं जिन्हें रिकॉर्डिंग मिटा सकती है, मगर जिम्मेदारी नहीं। एक असाधारण वस्तु, दो रिकॉर्डिंग और दबे हुए सच के बीच उसे तय करना है कि किसे सुनना है और किस आयोजन को रोकना है। मौन की महारानी शक्ति की चमक से अधिक, उसकी कीमत और शहर में अनसुनी रह गई आवाज़ों की कहानी है।
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