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इकतालीस मीटर नीचे एक दीवार खुली, जिसके किसी कोने पर आँख भरोसा नहीं कर पाती। निर्वर्त की मेट्रो खुदाई में इंजीनियर नेहा बख्शी, पुरातत्वविद फरहान इलाही और ऑपरेटर काकू सीमित निरीक्षण के लिए उतरते हैं। उनके पीछे ठेकेदार विक्रम धाकड़ अपनी अलग योजना लेकर आता है। लौटने की रस्सी कटती है। पानी बढ़ता है। रास्ते अपने आकार बदलते हैं। भीतर दर्पण नाम का एक कल्पित तंत्र उनकी गिनती सुनता है। हर भ्रम के पीछे माप है, लेकिन हर माप के पीछे उनका अपना अधूरा सच भी। नेहा के पास एक पुरानी भोजन-डिब्बी है। काकू की तेरह गाँठों में घर लौटने का रास्ता बँधा है। मायासभा एक पूर्णतः काल्पनिक भूमिगत साहस-कथा है, जिसमें रास्ता खोजने के साथ उन लोगों तक लौटने की कोशिश भी है जो ऊपर प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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