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कबीर तिवारी के हाथ में मीरा की डायरी है, जिसका आख़िरी पन्ना अधूरा रह गया है। फेवा झील के किनारे बैठा वह उस प्रेम को याद करता है जिसने दिल्ली से बेतिया और पोखरा तक उसकी दुनिया बदल दी। शहरों, यात्राओं, अनकहे सच और खोने के डर के बीच यह प्रेमकथा पूछती है कि किसी के चले जाने के बाद उसके साथ जीना कैसे सीखा जाए।
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