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अस्पताल से लौटने के बाद अदिति के सामने उसकी अपनी आवाज का एक ऐसा अंश आता है, जिसका समय और अर्थ उसकी याद से मेल नहीं खाते। उसकी मित्र वसुधा लापता है, और घर की परिचित चीजें नए सवाल खड़े कर रही हैं। दूसरों की आवाजें जोड़ने वाली अदिति को अब अपने पुराने काम, टूटे भरोसे और अधूरी यादों के बीच यह समझना है कि किस बात का प्रमाण उसके पास है और किस बात को किसी और ने उसके लिए गढ़ा है।
जब अपनी आवाज भी किसी दूसरे की कहानी सुनाने लगे, तो अपने अनुभव पर फिर भरोसा करने का रास्ता कहाँ से शुरू होता है?
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