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पटना, 2026। पति उमेश के जाने के बाद स्कूल शिक्षिका अर्चना प्रसाद के पास बस दो बच्चे हैं, पंद्रह साल का शुभम और सात साल की तान्या, और पुरखों का वह पुराना मकान, जिसकी छत के नीचे उसने पूरी गृहस्थी संभाली है। फिर देवर विमल, कर्ज में डूबा हुआ, मकान बेचने की ठान लेता है। और मकान तो ससुर रामनारायण के नाम दर्ज है। अर्चना के नाम पर क्या है? सिर्फ बरसों की मेहनत और एक सवाल: क्या विधवा का घर में कोई हिस्सा नहीं? सास शारदा, बगल के द्वारिका बाबू और वकील रंजना वर्मा के साथ अर्चना कागजों, दीवानी मुकदमे और सुलह की मेज से गुजरती है, और अंत में एक ऐसे समझौते तक पहुँचती है जिसमें घर मंजिल-दर-मंजिल बँट जाता है। पैसा भारी है या रिश्ता? और एक औरत की इज्जत की कीमत कौन तय करेगा?
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