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मास्को के अभिलेखागार की सबसे गहरी दराज़ से एक लाल फ़ाइल ग़ायब हो गई है। उसमें बारह शहरों के नाम हैं, दो स्याहियों में लिखे हुए। एक स्याही वह है जो दिखती है। एक वह, जिसे पढ़ने की कीमत किसी की जान है।
नताशा ओरलोवा के पास वह फ़ाइल है। शून्य के पास वे सारे रास्ते हैं जिनसे वह भाग सकती है। और कबीर सिंह के पास सिर्फ़ एक वादा है — उसे ज़िंदा दिल्ली पहुँचाने का।
ट्रांस-साइबेरियाई की दौड़ती छतों से बैकाल की गूँजती बर्फ़ तक, और दिल्ली के उस सम्मेलन तक जहाँ एक कलम बारह शहरों की क़िस्मत लिखने वाली है — यह कहानी है उस पुराने हिसाब की जो अब चुकता होगा, और उस मोहब्बत की जो अभी शुरू हुई है।
शून्य अपनी कुर्सी पर बैठा इंतज़ार कर रहा है।
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