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आरा का बेरोज़गार युवक अरविंद अपनी माँ की बीमारी और अधूरे सपनों के बीच जीवन का अर्थ खोज रहा है। एक रात वह यमलोक पहुँच जाता है, जहाँ यमराज और चित्रगुप्त उसे सीमित समय के लिए मृत्यु का दायित्व सौंपते हैं। कर्म, न्याय और ब्रह्मांडीय व्यवस्था से जूझते हुए वह समझने लगता है कि जीना केवल साँस लेते रहना नहीं है। माँ की आँखों, मित्रता और एक डॉक्टर की मुस्कान में छिपी आशा उसे धरती से फिर जोड़ती है। मृत्यु के प्रश्न से शुरू होकर यह मानवीय कथा प्रेम, जिम्मेदारी और सचमुच जीना सीखने तक पहुँचती है।
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