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मीनाक्षी "मिनी" मित्रा कुम्हारटुली में मूर्तियों को रंग देना सिखाती है। उसके पति सौमित्र चार साल पहले एक दिन अचानक लापता हो गए, और बेटा देबू अब भी हर शाम दरवाज़े की ओर देखता है। जनवरी के कोहरे में मिनी की आँखें बदलने लगती हैं। रंग उलटने लगते हैं, परछाइयाँ अपनी जगह बदलती हैं, और रोशनी उसके हाथों में आकार लेने लगती है। हर बार इसकी क़ीमत उसकी आँखें चुकाती हैं। एक रंगहीन दूत, एक पुरानी सरकारी फ़ाइल और कॉलेज स्ट्रीट के पीले पन्ने उसे उस सच तक ले जाते हैं जिसे किसी ने बरसों दबाए रखा। क्या मिनी वह सब देख पाएगी, जो उसकी आँखें दिखाना चाहती हैं?
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